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नई दिल्ली, भारत
नहीं कोई दिव्य शक्ति, मेरे भीतर मौजूद! सपनो की छेनी से ही मैंने अपना अस्तित्व गढ़ा है!!

Sunday, 16 August 2009

ज़रूरत शुरुआत की है.....

देश के हालात ठीक नहीं हैं। युवा नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस पार्टी ने जीत तो हासिल कर ली लेकिन व्यवस्था को सुधारने की दिशा में उन्होंने अब तक कोई ठोस कदम नही उठाया। सच कहें तो हमे अब बुद्धिजीविओं का एक बड़ा संगठन बनाने की ज़रूरत है तभी हम कुछ कर सकने की स्थिति में होंगे नही तो यूँ ही टुकडों में काम करते हुए हम कुछ भी कर सकने में असमर्थ हैं। "एक सामूहिक क्रांति से ही देशव्यापी बदलाव लाया जा सकता है"। ज़रूरत शुरुआत की है.....

Sunday, 2 August 2009

हेबिटेट फ़िल्म क्लब द्वारा सिनेमा कार्यशाला की तिथि घोषित

हेबिटेट फ़िल्म क्लब, नई दिल्ली के तत्वावधान में सिनेमा पर कार्यशाला का आयोजन २३ अगस्त से १० सितम्बर के मध्य संपन्न होगा। इंडिया हेबिटेट सेंटर के अगस्त माह के कैलेंडर के माध्यम से आज मुझे यह जानकारी मिली।


Thursday, 16 July 2009

सुविचार


जीवन में भय, पीड़ा और हार हमेशा होते हैं। कोई भी उनकी उपेक्षा नही कर सकता। लेकिन ऐसे में बेहतर होता है सपनों को साकार करने के संघर्ष में कुछ लड़ाइयां हार जाना, बजाय इसके कि बगैर यह जाने हार जाना कि आप किस चीज़ के लिए लड़ रहे हैं।


जीवन कोई सीधा या आसान गलियारा नही है जिसमे हम उन्मुक्तता से बिना रुके हुए चले जाएँ, बल्कि गलियारों की एक भूल-भुलैया है, जिसमे हमे अपना मार्ग खोजना पड़ता है। कई बार हम भटक जाते हैं, दुविधा में होते हैं, और अंधी गली में रुक जाते हैंपरंतु हमेशा यदि हममे आस्था है, ईश्वर हमारे लिए द्वार खोल देगा, शायद वह द्वार नही जिसकी खुलने की हमने कल्पना की थी, परंतु वह द्वार जो हमारे लिए अंततः अच्छा सिद्ध होगा।


- ए जे क्रोनिन

Wednesday, 15 July 2009

इंडिया हेबिटेट सेंटर: रिचर्ड एलन और इरा भास्कर की किताब पर चर्चा

पिछले सप्ताह बॉलीवुड से जुड़ी हुई एक और किताब प्रकाशित होने के बाद बाज़ार में उपलब्ध हो गई है। यह किताब बॉम्बे सिनेमा को इस्लामियत से जोड़ती है और यह बताती है की भारतीय फिल्मों में किस तरह से मुस्लिम समाज और उसके रीति-रिवाजों एवं सभ्यताओं को समय-समय पर मुख्य विषय के रूप में चुना गया और फिल्मे सफल हुई। उदाहरण के तौर पर "चौदवी का चाँद, मुग़ल-ऐ-आजम, गर्म हवा , नजमा, उमराव जान, जोधा अकबर इत्यादि पर किताब में विस्तृत चर्चा की गई है। यह किताब फ़िल्म विषयक जानकारी रखने वालों के लिए संग्रहणीय है।

हेबिटेट सेंटर में आयोजित चर्चा के दौरान लेखक द्वय रिचर्ड एलन (चेयर, फ़िल्म स्टडीज, न्यूयार्क यूनिवर्सिटी) और इरा भास्कर ( प्रोफेसर , स्कूल ऑफ़ एस्थेटिक्स, जेएनयू ) किताब के मुख्य पहलुओं पर अपने विचार रखे।
रिचर्ड एलन ने बताया कि किताब लिखने का विचार उन्हें अबुधाबी फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान आया और वहीं उनकी मुलाकात इरा जी से हुई और उन्होंने इस विषय पर किताब लिखने का फ़ैसला किया।

किताब : Islamicate Culture ऑफ़ बॉम्बे सिनेमा ।
लेखक : रिचर्ड एलन, इरा भास्कर।
Price : ९५०/-

Thursday, 2 July 2009

एक महीने की छुट्टी के बाद...

अपने गृहनगर रायगढ़ में लगभग एक महीने रहकर मैं २३ जून को दिल्ली लौट आया। तब यहाँ गर्मी अपनी चरम अवस्था में थी। रहने को एक मात्र कमरा अत्यधिक गर्मी से तप जाता था और फिर कमरे के भीतर रहना बड़ा ही मुश्किल काम होता था। ज़िन्दगी पसीने से तर-बतर थी और इस कारण से कहीं आने जाने का कोई कार्यक्रम निर्धारित नही हो पाता था। तकरीबन एक सप्ताह के बाद हलकी बारिश से अब मौसम परिवर्तित हुआ है और रुके हुए कार्यों को पुरा करने की गति में तीव्रता आई है। इस बीच रायगढ़ यात्रा से जुड़ी कुछ बातें अब भी मेरे जेहन में ताज़ा हैं। दिल्ली आने के बाद से यह पहला मौका था जब रायगढ़ यात्रा के दौरान मैं पुरे एक महीने रुका और दोस्तों से मुलाकात कर कुछ और नए दोस्त बनाये। इसी दौरान ही मैंने रायगढ़ के सभी महत्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण किया और बेहतरीन नजारों को अपने कैमरे में कैद किया। अब एक बार फिर से नई ऊर्जा के साथ मैं आगे बढ़ने को तत्पर हूँ।

Saturday, 2 May 2009

नई शुरुआत के लिए...

पकी, तो कट गई
थी बड़ी मीठी
फसल इश्क की।
बाकीं हैं बस
कुछ खतों के फूस
कुछ ख्याली गन्नों के ठूंठ।
उखाड़ दे इन्हें !
जला इन्हें !
अब करनी है तैयार
ज़मीन-ऐ-जिंदगी
नई फसल के लिए।

साभार:
धुप के रंग (विकी आर्य)
पेंगुइन बुक्स

Thursday, 30 April 2009

सर्वश्रेष्ठ फिल्म....

मैंने यह कभी भी नही सोचा था कि अपने करियर यात्रा के दौरान मुझे मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्म का चुनाव करना होगा और वो भी किसी संस्थान में दाखिले के लिए। लेकिन यह सच है कि आज मेरे सामने एक अजीब सी उलझन है। आई आई टी मद्रास कमल हासन के सहयोग से स्क्रीनराइटिंग का वर्कशॉप आयोजित कर रहा है। दाखिले के लिए सभी उम्मीदवारों को एक सबसे पसंदीदा फ़िल्म कि सिनोप्सिस (२०० शब्द ) और साथ ही पाँच पसंदीदा फिल्मों कि लिस्ट भेजनी है।
अब मेरे सामने मुश्किल ये है कि बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में हैं जो मुझे बेहद पसंद है जैसे कि दो बीघा ज़मीन, दो आँखें बारह हाथ , मदर इंडिया , श्री ४२०, संगम, आवारा , गाइड, नया दौर, सौदागर , आनंद , दीवार, त्रिशूल, अभिमान, दो अनजाने , मेरा नाम जोकर, अर्थ, मि इंडिया , हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे , दिल चाहता है, लगान, पेज-३, बीइंग सायरस, द नेमसेक , ब्लैक, इकबाल, मनोरमा, अस्तित्व, चक दे इंडिया, तारे ज़मीन पर आदि ।
वैसे बहुत सोचने के बाद मुझे लग रहा है कि अमिताभ अभिनीत दीवार को मैं अपनी पसंदीदा फ़िल्म के लिए चुन लूँ तो ग़लत नही होगा। इसके अलावा अन्य पाँच फिल्मों में दो बीघा ज़मीन, नया दौर, अर्थ, इकबाल, तारे ज़मीन पर आदि को सम्मिलित कर सकता हूँ।