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नई दिल्ली, भारत
नहीं कोई दिव्य शक्ति, मेरे भीतर मौजूद! सपनो की छेनी से ही मैंने अपना अस्तित्व गढ़ा है!!

Saturday, 2 May 2009

नई शुरुआत के लिए...

पकी, तो कट गई
थी बड़ी मीठी
फसल इश्क की।
बाकीं हैं बस
कुछ खतों के फूस
कुछ ख्याली गन्नों के ठूंठ।
उखाड़ दे इन्हें !
जला इन्हें !
अब करनी है तैयार
ज़मीन-ऐ-जिंदगी
नई फसल के लिए।

साभार:
धुप के रंग (विकी आर्य)
पेंगुइन बुक्स